Wednesday, July 20, 2016

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी जब भी मुस्कराएगी
हर झरोखे से महक आएगी

ज़रा खोलो तो पंख हिम्मत के
ये ज़मीं छोटी नज़र आएगी

रिश्ता

जब मिलो किसी से तो जरा दूर का रिश्ता रखना,
बहुत तङपाते हैँ अक्सर सीने से लगाने वाले .

नफरत

सुना है की नफरत की दुकान खोल रहे हो...!!
थोड़ी मोहब्बत भी रख लेना दिखावे के लिए...!!

मयखाना

मैंने ही मयखानों को मयखाना बनाया...!!
और मेरे ही मुक़द्दर में कोई जाम नहीं है...!!

रिश्वतों

चल रहें हैं ज़माने भर में रिश्वतों के सिलसिले...!!
कुछ तुम भी ले दे कर हमसे मोहब्बत कर लो...!!

धड़कन

वो मेरे दिल पर सिर रखकर सोई थी बेखबर;
हमने धड़कन ही रोक ली.......... कि कहीं
उसकी नींद ना टूट जाए।

Tuesday, June 14, 2016

शख्स

उस शख्स से फ़क़त,
       .... इतना सा ताल्लुक है
मेरा,
      वो परेशान होता है,..
                              .......तो
...
..
.
मुझे नींद नही आती है.....

नमालूम

कल अपनी पीठ से निगाहें मिली . . . . .
अनगिनत ख़ंज़र  और थोड़ी सी शबाशिया  पड़ी मिली .
! !
~नमालूम

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था
मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था

तेरी तस्वीर से करता था बातें
मेरे कमरे में आईना नहीं था

समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा
मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था

मनाने रूठने के खेल में हम
बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था

सुना है बंद कर लीं उसने आँखें
कई रातों से वो सोया नहीं था

-Meraj Faizabadi

निदा फ़ाज़ली

कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दांब लगे,
वो बदऩ जब भी सजे, कोई नया ख्वाब़ लगे__!

                                  _____निदा फ़ाज़ली

سہارا لینا ہی پڑتا ہے مجھ کو دریا کا،
میں ایک قطرہ ہوں تنہا تو بہ نہیں سکتا..
(نامعلوم)

सहारा लेना ही पड़ता है मुझको दरिया का,
मैं एक कतरा हूँ तनहा तो बह नहीं सकता.....

अमृता

चाँद सूरज जिस तरह
झील में उतरते हैं
मैने तुम्हे देखा नहीं
कुछ नक्श से उभरते हैं ...
--- अमृता

Saturday, April 30, 2016

मुहब्बत

ये मुहब्बत की चोट भी क्या खूब है...

इंसान भी मर जाता है और कातिल भी प्यारा लगता है.

Friday, April 8, 2016

मुकेश  मणियार

तो यह शिल्प जरूर
" ईश्वर " ने ही
बनाया होगा ।
   ----  मुकेश  मणियार  ।

Saturday, April 2, 2016

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए...

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए

मौत भी आती नहीं, आस भी जाती नहीं
दिल को यह क्या हो गया, कोई शैय भाती नहीं
लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ

एक जाँ और लाख ग़म, घुट के रह जाए न दम
आओ तुम को देख लें, डूबती नज़रों से हम
लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए
-साहिर लुधियानवी

न रवा कहिये न सज़ा कहिय.

न रवा कहिये न सज़ा कहिये
कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये

दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़
इस को हर्गिज़ न बर्मला कहिये

वो मुझे क़त्ल कर के कहते हैं
मानता ही न था ये क्या कहिये

आ गई आप को मसिहाई
मरने वालो को मर्हबा कहिये

होश उड़ने लगे रक़ीबों के
"दाग" को और बेवफ़ा कहिये
-दाग़ देहलवी

कबीर

1.

अरे दिल,

प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्‍यों आया त्‍यों जावैगा।।

सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्‍या क्‍या बीता।।

सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा।।

परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्‍यान न धरिया।।

टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा।।

दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई।।

चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा।

2.

रहना नहीं देस बिराना है।

यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है।

यह संसार काँटे की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।

यह संसार झाड़ और झाँखर, आग लगे बरि जाना है।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।
-कबीर

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो...

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो

तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

किसी दुख का किसी चेहरे से अंदाज़ा नहीं होता

शजर तो देखने में सब हरे मालूम होते हैं

ज़रूरत से अना का भारी पत्थर टूट जात है

मगर फिर आदमी भी अंदर—अंदर टूट जाता है

मोहब्बत एक ऐसा खेल है जिसमें मेरे भाई

हमेशा जीतने वाले परेशानी में रहते हैं

फिर कबूतर की वफ़ादारी पे शल मत करना

वह तो घर को इसी मीनार से पहचानता है

अना की मोहनी सूरत बिगाड़ देती है

बड़े—बड़ों को ज़रूरत बिगाड़ देती है

बनाकर घौंसला रहता था इक जोड़ा कबूतर का

अगर आँधी नहीं आती तो ये मीनार बच जाता

उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं

क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं

प्यास की शिद्दत से मुँह खोले परिंदा गिर पड़ा

सीढ़ियों पर हाँफ़ते अख़बार वाले की तरह
-मुनव्वर राना

लाओ अपना हाथ मेरे हाथ में दो

लाओ अपना हाथ मेरे हाथ में दो

नए क्षितिजों तक चलेंगे

हाथ में हाथ डालकर

सूरज से मिलेंगे

इसके पहले भी

चला हूं लेकर हाथ में हाथ

मगर वे हाथ

किरनों के थे फूलों के थे

सावन के

सरितामय कूलों के थे

तुम्हारे हाथ

उनसे नए हैं अलग हैं

एक अलग तरह से ज्यादा सजग हैं

वे उन सबसे नए हैं

सख्त हैं तकलीफ़देह हैं

जवान हैं

मैं तुम्हारे हाथ

अपने हाथों में लेना चाहता हूं

नए क्षितिज

तुम्हें देना चाहता हूं

खुद पाना चाहता हूं

तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर

मैं सब जगह जाना चाहता हूं !

दो अपना हाथ मेरे हाथ में

नए क्षितिजों तक चलेंगे

साथ-साथ सूरज से मिलेंगे !
-भवानीप्रसाद मिश्र

Sunday, March 27, 2016

देखिये इश्क में अब कौन सा जादू निकले- महबूब सोनालिया

देखिये इश्क में अब कौन सा जादू निकले।
मेरे अंदाज़े बयां से तेरी खुशबू निकले।

आज़माइश पे उतर आये सराबो की अगर
रेत से प्यास को पीते हुए आहू निकले।

हाथ शामिल था मेरे झुर्म में जिन लोगोका।
फैसला करने मेरा उनके तराजू निकले।

उनकी ख़ुश्बू से फ़ज़ा सारी महक उठती है।
जब भी लहराते हुए अपने वो गेसू निकले

नींद जब बोझ बढ़ा देती है पलको पे मेरी:
तब ग़ज़ल कहने के भी ज़हन से पहलू निकले

जब मिरे कान्धे से कन्धे को मिलाये बेटा।
मैंने महसूस किया तब मिरे बाज़ू निकले

ज़िन्दगी मेरी अन्धेरों से निकल सकती है
मेरी यादों के उजालों से अगर तू निकले

जम गया है मेरी पुतली पे कोई सदमा यूँ।
मैंने चाहा तो बहुत फिर भी न आंसू निकले
-महबूब सोनालिया